सफर…

कुछ सफर तय किये जाते हैंनंगे पाँव ही…. बादलों पार के महलों में,घास पे हरी दोपहरों में,ख़्वाबों की देहलीज़ लाँघते हुए,पत्थर छू के… दुआ माँगते हुए… नव विवाहिता के गृह प्रवेश पर,राम द्वारा भरत के लिए आदेश पर,तिरंगे के सामने, सम्मान के समय,देवता मनाने को, उनके आह्वान के समय… सुदामा के आने की ख़बर को …

देवताओं के स्वप्न 

मैं देखती हूँ  स्वप्न में तुम्हें और तुम्हारे स्पर्श को सच सा पाती हूँ मैं देखती हूँ तुम्हें आँखें मलते मुझे देखते हुए अचरज़ करते हुए मैं देखती हूँ  कि तुम भी इस धोखे में हो कि हम मिल गए हैं, और बस एक  ख़्वाब है, ये यथार्थ… मैं स्वप्न से बाहर आती हूँ और …