घर भी कुछ कहता है…

शाहरुख़ की नई मूवी का गाना सुना और पहली ही बार सुनने पर लगा कि घर पर रहने वाले लोगों… या यूँ कहें कि जिन्हें छोड़ कर चले जाते हैं उन लोगों की इतनी ज़िम्मेदारी तो बनती ही है कि वो जाने वालों के घरों को सहेज़ के रख सकें… निकाल सकें उनके लिए एक हिस्सा हर खुशी और ग़म में… कि उन्हें भी इल्म रहे कि परदेस में रहने पर भी उनके अपने देस में एक कोना है जो उनका ही रहने वाला है, जहान भर की थकान को खुद में ज़ब्त कर सकने की ताकत उन बूढ़े हो चले घरों में सदा ही रहती है…

यही सोच कर लिखना शुरु किया… घर बनकर लिखना शुरू किया…

निकले थे कभी हम घर से,
घर दिल से मगर नहीं निकला,
घर बसा है हर धड़कन में,
क्या करें हम ऐसे दिल का।

-निकले थे कभी तुम मुझसे, मैं दिल से मगर नहीं निकला। मैं बसा हूँ हर धड़कन में, क्या करोगे ऐसे दिल का।

वनवास चाहे मिला हो या स्वयं चुना हो, चाहे घर से जाने का मकसद पैसा कमाना हो, या अपनी ज़िन्दगी को बचाना। घर से दूर होने पर आँखें अक्सर नम ही रहती हैं। पर क्या कभी तुमने सुना है कि घर तुमसे क्या कहता है?

बड़ी दूर से आए हैं,
बड़ी देर से आए हैं,
पर ये ना कोई समझे,
हम लोग पराए हैं।

-बड़ी दूर से आए हो, बड़ी देर से आए हो। तुम जन्मे यही थे फिर, तुम कैसे पराए हो?

तुम मेरे अपने हो और मैं, मैं वही बदनसीब मकान जिसे तुमने अपनी मौजूदगी से घर बनाया था। और फिर वीरान करके चले गए। अब तुम इसे शिकायत समझो तो समझते रहो पर जैसे बचपन में तुम बैठ जाते थे मेरे आँगन में अपने खिलौने बिखेर कर, या बड़े होने के बाद बीजी खोल के बैठती थी तुम्हारे बचपन का पिटारा जिसमें तुम्हारे बचपन के कपड़े, खिलौने, तस्वीरें निकलती थी, और जहाँ एक और हँसी की गूंज सुनाई पड़ती थी वहीं कुछ आँखें नम हो जाया करती थीं, ठीक वैसे ही आज मन है कि तुम्हारे जाने के बाद उम्ड़े हुए उन ख्यालों को तुम्हारे सामने बिखेर दूँ। हँसी या उदासी तो तुम जानो, शिकायत या ख्याल ये भी तुम्हारा ही फैसला होगा, पर इस बूढ़े हो चले घर को भी अपना पक्ष रखने का एक मौका तो मिलना ही चाहिए…

कट जाए पतंग जैसे,
और भटके हवाओं में,
सच पूछो तो ऐसे,
दिन हमने बिताए हैं,
पर यह ना कोई समझे,
हम लोग पराए हैं।

-तुम जानते हो तुम्हारे जाने के बाद क्या हुआ यहाँ? जब तक बीजी रही तुम्हारे हिस्से की एक कटोरी सब्जी और रोटी का आटा हमेशा अलग रखा जाता था, कि शायद तुम लौट आओगे और भूख से बेहाल होगे। चाय की टपरी जब तक रही तब तक तुम्हारे हिस्से की चाय हर शाम बचती रही। जिसे बाद में पशु और पक्षी खाते। सबकी आँखों में नमी देकर गए तुम, और साथ लेकर गए छेहरों की चमक, उनकी खुशी। गुरुद्वारे को जाती हुई बस में हर इतवार को एक सीट खाली छोड़ी जाती रही कि शायद अगले मोड़ पर तुम बैठ जाओगे और कहोगे कि सुकून तो अपने देश में ही है। वो बेमतलब के शोर-शराबे जो तुम्हें कभी सोने नहीं देते थे, वो फिर चाहे गणेश विसर्जन की भीड़ हो या कोई चुनावी रैली, जब यहाँ से गुजरते तो शोर अचानक से और तेज़ हो जाता। जैसे तुम सोए हो और तुम्हें जगाने की साज़िश हो कोई। इस उम्मीद में कि तुम झुंझुला के उठोगे और कहोगे कि ये शोर कहीं और जाकर करें। सच कहूँ तो किसी ने तुम्हारी अनुपस्थिति को स्वीकार ही नहीं किया। सब इस उम्मीद में ज़िंदा रहे कि तुम हो यही और शायद ज़िन्दगी सबके साथ मजाक कर रही है। तुम… तुम जो इस गाँव के कन्हैया थे, तुम तो ऐसे गए जैसे कृष्ण गए थे नंद बाबा की नगरी को छोड़ के। कभी वापस ना आने के लिए। तुम्हे तो ऐसे जाना था जैसे राम गए थे वनवास, लौट आने का वादा लिए। ज़िन्दगी तुम्हे चुनने का अवसर दे, तो तुम राम होना ही चुनना। तुम एक बार बस आने के लिए आ जाना। तुम एक बार वो कभी ना किया हुआ वादा निभाने के लिए आ जाना।

यही नगर यही है बस्ती,
आँखें थी जिसे तरसती,
यहाँ खुशियाँ थीं कितनी सस्ती,
जानी पहचानी गलियाँ,
लगती हैं पुरानी सखियाँ,
कहाँ खो गई वो रंग रलियाँ,

बाजार में चाय के ढाबे,
बेकार के शोर शराबे,
वो दोस्त वो उनकी बातें,
वो सारे दिन सब रातें,

कितना गहरा था ग़म,
इन सब को खोने का,
यह कह नहीं पाए हम,
दिल में ही छुपाए हैं,

पर ये ना कोई समझे,
हम लोग पराए हैं,
निकले थे कभी हम घर से,
घर दिल से मगर नहीं निकला,
घर बसा है हर धड़कन में,
क्या करें हम ऐसे दिल का,

-अब जब लौटकर आओगे तो शायद वो सभी जवान काँधे बूढ़े हो चले हों। कोई शायद तुम्हें अपने हाथों में ना उठा पाए। तुम्हें वह चाय की टपरी मिले ही ना जो शायद आधुनिकता की भेंट चढ़ गई होगी। देश की तरक्की में, इन आलीशान सड़कों, महल जैसे मकानों में, खूबसूरत पार्कों में, ना जाने कितनी चाय की टपरी नींव में दबी पड़ी है। शायद ना मिले तुम्हें वह बेकार का शोर दुबारा, क्योंकि अब तो डेसिबल कितना हो उसका फैसला सुप्रीम कोर्ट करता है। सुना है देश विदेश जैसा हो रहा है। तुम कभी तो सोचते तो होगे वैसे कि तुम्हारे बाद तुम्हारे घर, तुम्हारे लोग, तुम्हारा गाँव का क्या हुआ होगा। वह जो एक छोटा सा स्टेशन है शहर का, क्या उसकी धूल तुम्हारे पैरों से लिपटती है सपनों में? क्या तुम्हे तुम्हारा बचपन याद आता है? शायद तुम जब वापस आओगे तो तुम्हें मुझमें भी अपनापन ना लगे। ये आँगन जैसा तुम छोड़ के गए थे शायद तुम्हे वैसे ना मिले। या तो मैं नवीनीकरण, अधुनीकरण की भेंट चढ़ गया होगा, और हर जगह तुम्हें नए टाइल्स, नया फ्लोर, नया कंस्ट्रक्शन ही मिलेगा। या हो सकता है कि मुझे देखा ही ना हो किसी ने। और तुम आओ तो तुम्हें बस एक खंडहर ही मिले… हो सकता है कि जब तक तुम लौट कर आओ, मेरी दीवारों में जान ही ना बचे, हो सकता है कि वह सीढ़ियाँ जो पहले माले पर तुम्हारे कमरे में जाती थीं, वह अब कहीं ना जाती हो, बीच में ही कहीं खत्म हो जाती हो। हो सकता है कि तुम छत तक कभी पहुंच ही ना पाओ। रसोई से अब तुम्हें कोई खुशबू नहीं आएगी। शायद सीलन की बदबू आए। हो सकता है कि तुम्हें लगने लगे कि तुम्हारी गैर हाज़िरी में किसी ने तुम्हारे घर का ध्यान ही ना रखा। पर सच तो यही है कि एक वक्त के बाद हर चीज़ खत्म हो जाती है। वादे भी.. और इंतज़ार भी..

क्या हमसे हुआ क्या हो ना सका,
पर इतना तो करना है,
जिस धरती पे जन्मे थे,
उस धरती पे मरना है,
जिस धरती पे जन्मे थे,
उस धरती पे मरना है।

तुम आओगे या नहीं ये तो नहीं पता, पर इतना पता है कि जिस धरती पे तुम जन्मे, वह खण्डहर भी घर ही रहेगा। बदलाव तो नियति का नियम है फिर भी, मेरे इस आँगन की मिट्टी में तुम्हें अब भी सुकून मिलेगा। बस इतना ही कहना है कि जहाँ तुम जन्मे थे वहाँ मेरे रहते तो कोई तुम्हें पराया नहीं बुलाएगा। तुम लौट आना… तुम एक बार लौट आना। जब ज़िन्दगी चुनाव का मौका दे तुम्हें, तुम राम होना ही चुनना। तुम एक बार बस आने के लिए आ जाना… तुम एक बार मेरे पास लौट आने के लिए आ जाना…

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