कुंमारसम्भव

कुछ दिन पहले ट्विटर पर श्रद्धा के एक ट्वीट से इस किताब के बारे में पता चला.. किंडल पर फ्री थी तो पढ़ना शुरू कर दिया.. कालिदास जी की कहानी का हिंदी अनुवाद है ये और इतना सुमधुर कि एक एक चित्र जीवंत हो उठता है.. कभी लगता है संस्कृत का अध्य्यन छोड़ना नहीं चाहिए था…

एक और बहुत विचित्र बात ये है कि जब मैं इसे पढ़ रही होती हूँ तो गहरी नींद में कब चली जाती हूँ पता ही नहीं चलता… और सपने भी अच्छे ही आते हैं… एक अरसे के बाद कहानी पढ़ने की कोशिश है..

कल से जो बहस चल रही थी, अनपढ़ और पढ़ी लिखी स्त्रियों के बारे में… वो सब यहाँ आकर शांत हो जाती हैं दरअसल सामंजस्य बिठाना ही घर को स्वर्ग बनाने का एकमात्र तरीका है.. पुरुष परिवार से संबंधित किसी कार्य में अपनी पत्नी की राय को सम्मलित करे, और स्त्री भी उनकी इच्छा का मान रखे…..

कुमारसंभव पढ़ते हुए जब इतना सजीव वर्णन हो, और सब की दशा के बारे में विस्तार से पढ़ लिया हो, ऐसे में मात्र चार पंक्तियों में इतना सुंदर भाव लिखा दिखता है, तो आंखें अनायास ही भर आती हैं…

कालिदास जी जब शाम का वर्णन करते हैं तो महादेव स्वयं अपनी वाणी से माता पार्वती को ये सब कह रहे होते हैं, ऐसे में जब ये पंक्तियाँ सामने पड़ती हैं तो याद आता है, कि वहाँ उस पर्वत पर महादेव के साथ हम नहीं बैठे हैं, हमारे गुंघराले बाल नहीं हैं, हमारे शहर में वैसी शाम नहीं हुई है…

हमारे यहाँ आरती के समय सुना, भोला, पार्वती का प्यारा…

भाव देखिए, महसूस कीजिये, और इस बात का साक्षात मानवीकरण देखना है, तो कुंआरसम्भव में बाबा कालिदास को पढ़िए….

तेरा तुझको अर्पण, क्या लागत है मोरा…

हाल ही में जो कविता लिखी, उसकी प्रेरणा मिली कालिदास जी से… यूँ समझिए कि ये पढ़ा और एक तस्वीर देखी, तो लगा कि सच में नीला रंग बहुत जरूरी है विधाता के लिए भी…

और इस प्रकार इस कहानी का समापन हुआ.. 2023 की पहली पुस्तक पूरी हुई.. और समापन हुआ 2 कविताएँ लिखने से.. मैंने तो बहुत कुछ सीख लिया, क्या आपने पढ़ा है कालजयी कवियों को?

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