पुस्तक समीक्षा- समय अभी तक वहीं खड़ा है

“चार दिन जिंदगी है सुना था मगर तीसरा दिन गया है बिना बात के…” जिस प्रतियोगिता को जीतने का इरादा ना हो, उसमें अकारण 3 घंटे बैठना पड़े तो आँखे खिड़की के बाहर कहानियाँ तलाशती हैं। एक ऐसे ही दिन खिड़की के बाहर मैंने देखा गुलमोहर का पेड़। और 3 घंटे तक कल्पेश जी का ये गीत मेरी चेतना में रहा।

गुलमोहर का पेड़ मेरे लिए हमेशा खुशियों का प्रतीक रहा है। ऐसा पहली बार हुआ कि किसी गीत को एक बार ही सुनने भर से वो आत्मा में इस तरह घुल गया कि मैंने स्वयं को उसे यदा-कदा गुनगुनाते हुए पाया। कल्पेश जी की पुस्तक प्राप्त हुई।

“समय अभी तक वहीं खड़ा है” नाम सुनकर लगा कि वाकई जिसने भी कल्पेश जी की कोई भी रचना सुनी है, उनके लिए समय अभी तक वहीं खड़ा है। वो पल कैमरे की रील की भाँति कैद हो गए हैं। इस पुस्तक की सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें कवि मन के द्वंद को बख़ूबी संजोया गया है। कल्पेश जी का हिंदी भाषा के प्रति प्रेम व समर्पण देखते ही बनता है। इस पुस्तक में धार्मिक, आध्यात्मिक, वैचारिक, प्रेम, इत्यादि अनेक विषयों पर बात हुई है। जो कविताएँ तुकात्मक नहीं हैं, वो भी गेय हैं।

माँ शारदे की वंदना से पुस्तक की शुरुआत होती है और कल्पेश जी की रचना “विराटरूप दर्शन” के लिए उन्हें समानित किया जाना चाहिए, ऐसा मेरे व्यक्तिगत मत है। “विराटरूप दर्शन” के समय शायद “श्री विट्ठल” जी की विशेष कृपा व “माँ सरस्वती” का आशीर्वाद ही रहा होगा जो इस कविता का एक एक शब्द पाञ्चजन्य का स्वर लिए हुए है।

कवि अपने शब्दों से रूठ जाता है, तो कहीं शब्द रूठ जाते हैं। “राइटर्स ब्लॉक” को इतनी खूबसूरती से बयान करने का अंदाज बेहद निराला है। कवि स्वयं को एक “शुभ संकल्प” मानते हैं, और शायद इससे खूबसूरत आत्म स्वीकृति मैंने आज तक नहीं पढ़ी है। कहीं पढ़ा था कि युद्ध नहीं होना चाहिए, पर जीवन सदैव युद्ध की तैयारी में बीतना चाहिए। अपने विद्यालय व प्रधानाध्यापक जी के लिए लिखी मेरी ये पंक्तियाँ, “महासमर की तैयारी में गीता हमें पढ़ाते रहे महाभारत बचाने हेतु रामायण सिखलाते रहे“, कल्पेश जी भी बारंबार युद्ध के विनाशकारी प्रभावों की ओर इंगित करते हैं। साथ ही ये भी कहते हैं कि युद्ध अवश्यम्भावी है। समर होगा तो रक्त भी बहेगा, समर के लिए हम तैयार भी नहीं हैं। फिर भी, स्वधर्म की खातिर कवि शुभ संकल्प लेते दिखते हैं, कि यदि युद्ध हुआ तो अर्जुन की भांति हम कृष्ण को समर्पित होंगे।

“गर्व भरे भारत मस्तक पर, जो किरीट अडोल रही है, मैं तो कहाँ बोल पाता हूँ, मेरी हिंदी बोल रही है।” जब कल्पेश जी कवि के रूप में अपनी सफलता का सारा श्रेय हिंदी को दे देते हैं, तब समझ आता है कि ये हिंदी के प्रचार प्रसार में कितनी तत्परता से लगे हैं। और जब ये कहते हैं कि, “मेरी कविता वापस कर दो” और “विरह नहीं लिखूँगा, जनन नहीं लिखूँगा” तब लगता है ये हिंदी भाषा का प्रेम कवि है जो इतना सरल हो गया है कि अपने पाठकों को किसी शिशु की भांति समझता है और नहीं चाहता “दुःख” लिखना।

“हम अपना फ़ोन हैं” एक ऐसी रचना है जिसके बारे में मैन सबसे अधिक विचार मंथन किया। और एक कविता तो कल्पेश जी ने विपरीतार्थक बिम्बों को समर्पित कर दी। कल्पेश जी ने आज के समय की कुरीतियों पर बड़े सहज भाव से और कहीं कहीं तो बिम्बों का सहारा लेकर बड़ी खूबसूरती से तंज़ कसा है। श्रृंगार तो ना जाने कितने लोग लिख रहे हैं, पर कल्पेश जी उस प्रेम को, उस खूबसूरती को, इतने सीधे-सरल शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं कि ऐसा लगता है वो हमारे ही शब्द हों जिनसे हम ही अनभिज्ञ रहे हैं। “चूल्हे के ईंधन की ख़ातिर, थोड़े स्वप्न जला लेंगे” में हर परिस्थिति में साथ निभाने का वादा। “एकांतिक क्षण है प्रिय बोलो, आगे अधिक विचारो ना” में प्रेम की अभिव्यक्ति। “सप्तपद अग्नि के फेरे, साथ में हमने लिए” में सप्तपदी का महत्व और वचनों को सात जन्म तक निभाने का वादा। “अब मिलन से भय लगता है, इसी विरह से मोह बड़ा है” में विरह में भी खूबसूरती का बखान। “यौवन से बतियाता आया, दर्पण भी अब मौन ढला है” में अजैविक वस्तुओं से भी प्रेम के बारे में बात कर लेने का हुनर। ड्रेसिंग टेबल, वार्डरॉब, आईना, घर का कूलर, सब कुछ ही तो प्रेम में प्रेमी का हो जाता है। और “तुमको लिखना कभी गीत आया है” “पिया मिलन की रात थी” और “प्रणय निवेदन” तो कालजयी रचना जैसी लगती हैं।

मुक्त रचनाओं को कल्पेश जी ने इस संग्रह में विशेष स्थान दिया है। कहने भर को ये छोटी रचनाएं हैं जिन्हें बस “कम शब्दों का” होने की वजह से शायद अपना अलग पन्ना नसीब नहीं हुआ है, पर ये एक एक रचना अपने आप में सम्पूर्ण कहानी बयान करती हैं।

“कैसे मुखरित होगा मन का शूल बताते जाना, तुम कविता की मंत्र विधि का मूल बताते जाना।”

“कविमन गहरी थाह है, पात सका है कौन उसके अपने गीत हैं, उसके अपने मौन।”

“लिखना आया हमें और न छोड़ा गया एक पिंजरा भी हमसे न तोड़ा गया पीर लिख लिख के सब पुरसुखन हो गए एक मिसरा भी हमसे न जोड़ा गया।”

कहने को 2-4 पंक्तियाँ पर कोई विस्तार से लिखने बैठे तो कल्पेश जी की एक एक पंक्ति पर उपन्यास लिखे जा सकते हैं, विचार मंथन किया जा सकता है। पर अगर आप 2 पंक्ति पढ़के कवि मन नहीं समझ सकें तो आप उपन्यास भी नहीं समझ पाएंगे।

इस पुस्तक के मिलने से एक ऐसे ख़ज़ाने की प्राप्ति हुई है, जिसे वर्षों तक सँजो के रखा जाएगा। मैं निश्चित रूप से ये कविताएँ अपनी बेटी को दूँगी ताकि वो अपने विद्यालय में इन्हें गा सके। यदि ये कविताएँ बच्चों के मन में पहले ही डाल दी जाएं, तो हम सुनिश्चित कर पाएँगे की आनी वाली पीढ़ी संस्कारों से ओत प्रोत होगी। और प्रेम रचनाएँ भी यदि वो पढ़ लें, तो शायद ज़िंदगी में ठोकरे थोड़ी कम लगेंगी..

-शिखा

कलपेश वाघ जी से आप ट्विटर के माध्यम से जुड़ सकते हैं, https://twitter.com/fictionhindi

पुस्तक आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं,https://www.amazon.in/SAMAY-WAHIN-KHADA-HINDI-POETRY/dp/B09PJH3PDF

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