देवताओं के स्वप्न 

मैं देखती हूँ 

स्वप्न में तुम्हें

और तुम्हारे स्पर्श को

सच सा पाती हूँ

मैं देखती हूँ

तुम्हें आँखें मलते

मुझे देखते हुए

अचरज़ करते हुए

मैं देखती हूँ 

कि तुम भी

इस धोखे में हो

कि हम मिल गए हैं,

और बस एक 

ख़्वाब है, ये यथार्थ…

मैं स्वप्न से बाहर आती हूँ

और सोचती हूँ

देवताओं के स्वप्न 

कैसे होते होंगे? 

क्या बाबा कैलाशी

जो त्रिकालदर्शी हैं,

कभी स्वप्न में देखते होंगे

कि काश वो भी आ जाते

सती के साथ उस यज्ञ में

तो ना देनी पड़ती 

माता सती को प्राणों की आहुति…

क्या नीलकंठ महादेव के स्वप्न  

उन्हें ले जाते होंगे वहाँ

जहाँ पुत्र गणेश ने

अपना शीश खोया था? 

क्या उनका नीला कंठ

रुन्दता नहीं होगा

ये सोच कर कि काश

वो अपने क्रोध पर 

नियंत्रण रख पाते… 

क्या द्वारकाधीश के स्वप्न

उन्हें बृज की गलियों में ले जाते होंगे? 

क्या वो रुक्मणि के साथ खड़े

राधा की स्मृतियों में खो जाते होंगे? 

कान्हा को ज्ञात था सब कुछ,

क्या उन्हें स्वप्न में दिखता होगा

निहत्ता खड़ा अभिमन्यु? 

क्या माधव को स्वप्न में 

सुनाई पड़ती होगी,

पाञ्चाली की चीख़,

दिखाई पड़ते होंगे

गांधारी के आँसू…? 

क्या कृष्ण भी डर जाते होंगे

उनकी नियति में लिखे,

उस एक बाण की पीड़ा से? 

क्या उनके स्वप्नों में भी

गोवर्धन पर्वत रक्षा करता है

गोकुल वासियों की?

क्या वो स्वप्न में देख पाते हैं,

गोपियों और उद्धव का संवाद?

क्या वो राधा की स्मृतियों को

बस स्वप्नों में सहेज़ते होंगे? 

क्या शबरी के झूठे बेर खाकर

राम के स्वप्न उन्हें ले जाते होंगे

सीता रसोई की स्मृतियों में?

क्या राम के स्वप्नों में

वो पकड़ लाते होंगे सोने के हिरन? 

क्या अशोक वाटिका में उदास

जानकी के स्वप्नों में, 

फिर कभी सोने के हिरण दिखे भी होंगे? 

क्या सीता सोचती होंगी कभी

कनक भवन के बारे में? 

क्या सीता के वन गमन के बाद

राम कभी कनक भवन में गए भी होंगे?

जब अकेले-ओ-उदास से राम

राजभवन से निकलकर जाते होंगे

कनक भवन की ओर,

तो क्या उनके स्वप्न उन्हें रोकते होंगे?

क्या राम के स्वप्न में वो

स्वयं को कोसते होंगे? 

क्या सीता के स्वप्नों में कभी उन्हें 

मिले होंगे वो आभूषण 

जो उन्होंने स्वयं नीचे गिराए थे? 

क्या राम अपने स्वप्नों में 

बचा लेते हैं, जटायू के प्राण? 

नियति तय करती है,

घटनाओं का क्रम, फिर भी,

स्वप्नों पर शायद

नियति का भी बस नहीं है… 

शायद स्वप्न में लोग 

देख लेते हैं अपने जीवन के

सबसे बड़े डर को.. 

फिर असल जिंदगी में भी

सहमें हुए रहते हैं…

शायद इसीलिए मैं तुम्हें देखती हूँ

अपने स्वप्नों में और

फिर कोई और मंजर देखने पर भी

डरती नहीं हूँ… 

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